World Environment Day 2021 : देहरादून की जिन शिराओं में दौड़ती थी जिंदगी, आज हो गई कंक्रीट

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सार

वर्तमान में भले ही कंक्रीट का जंगल दून की पहचान बन गया हो, लेकिन दो-ढाई दशक पूर्व ऐसा नहीं था। चारों तरफ हरियाली थी और बासमती की खुशबू फैली रहती थी।

देहरादून
– फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

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दून को कभी उत्तराखंड का वेनिस कहा जाता था। यहां कई ऐसी जलधाराएं थीं जो अठखेलियां करती थीं, लेकिन बदलते वक्त और विकास की अंधी दौड़ की वजह से दून को विशिष्ठ पहचान देने वाली नहरें और और नदियां अपना अस्तित्व खो चुकी हैं। कभी जिन नदियों में सालभर पानी बहता था वह अब बरसाती नदी बन गई हैं। कुछ नहरों ने तो नालों का रूप ले लिया लिया है और इनमें गंदगी बह रही है।

वर्तमान में भले ही कंक्रीट का जंगल दून की पहचान बन गया हो, लेकिन दो-ढाई दशक पूर्व ऐसा नहीं था। चारों तरफ हरियाली थी और बासमती की खुशबू फैली रहती थी। जो नहरें बासमती के खेतों, लीची व आम के बागों और साग-सब्जी की पैदावार को प्रोत्साहित करती थीं, और तन-मन को सुकून का अहसास भी कराती थी, वही नहरें आज गुम हो चुकी हैं।

वर्ष 2000 में दून के अस्थायी राजधानी बनने के बाद यहां एक के बाद एक नहरों को भूमिगत कर उन पर सड़कों का जाल बिछा दिया गया। अब यह नहरें कहां हैं, कैसी हालत में हैं किसी को नहीं पता। 

दून की प्रमुख नहरें 
राजपुर नहर- यह दून की सबसे पुरानी नहर मानी जाती थी। इस नहर को मसूरी स्थित रिस्पना नदी के उद्गम स्थल से पानी मिलता था। यह नहर मुख्यत: पीने का पानी मुहैया कराती थी, लेकिन बाद में जरूरी सुधार के बाद यह कुछ गांवों में सिंचाई के उपयोग में आने लगी। 36 किमी लंबी इस नहर से राजपुर, देहरादून, धर्मपुर, कारगी ग्रांट, अजबपुर कलां, अजबपुर खुर्द व बंजारावाला को पानी उपलब्ध करवाया जाता था।

बीजापुर नहर- 1841 में बीजापुर कैनाल नाम से बनी 47 किमी लंबी इस नहर के जरिये बीजापुर, कौलागढ़, बनियावाला, शुक्लापुर, अंबीवाला, रांगड़वाला, आर्केडिया ग्रांट, मोहनपुर ग्रांट आदि क्षेत्रों को पानी उपलब्ध होता था। गढ़ीचौक पर यह नहर दो हिस्सों में बंटकर कौलागढ़ नहर व कांवली नहर नाम से जानी जाती थी। कौलागढ़ से निकलने वाली नहर प्रेमनगर टी-स्टेट तक जाती थी तो कांवली नहर शिमला बाईपास के पीछे खेतों में निकलती थी। 

खलंगा नहर- सौंग नदी से शुरू होने वाली खलंगा नहर है। 100 किमी लंबी यह नहर मालदेवता से शुरू होकर केशरवाला, किद्दूवाला और रायपुर क्षेत्र में खेती के लिए पानी मुहैया कराती थी। रायपुर से आगे चलकर यह नहर रायपुर नहर कहलाती थी। वहां यह कई हिस्सों में बंट जाती थी। यह एक अंडरग्राउंड नहर थी, जो मालदेवता में देखी जा सकती है।

जाखन नहर- 1863 में बनाई गई 31 किमी लंबी यह नहर जाखन नदी के पानी को जाखन व रानी पोखरी के क्षेत्रों तक पहुंचाती थी।

कटापत्थर नहर- 1840 में इस नहर का निर्माण शुरू हुआ, जो 1854 में बनकर तैयार हुई। 26 किमी लंबी इस नहर से कटापत्थर, पिरथीपुर, लाखनवाला, फतेहपुर, तेलपुरा, ढकरानी आदि क्षेत्रों को पानी उपलब्ध करवाया जाता था।

धर्मपुर नहर- रिस्पना नदी से निकलने वाली इस नहर को ईस्ट कैनाल नाम से भी जाना जाता है। यह बारीघाट, दर्शनलाल चौक, नैनी बेकरी, बंगाली कोठी से आगे आकर खेतों में मिल जाती थी। इसी नहर से एक छोटी नहर धर्मपुर में बदरीपुर नहर से कटने वाली छोटी नहर से मिल जाती थी। यह राजपुर फीडर कहलाती थी। यहां से यह रेसकोर्स, चंद्रनगर होते हुए हरिद्वार रोड पहुंचकर कारगी नहर कहलाती थी और बंजारावाला के खेतों तक मिलती थी।

दून के आसपास कई नदियां थीं। इन नदियों में हमेशा पानी रहता था, लेकिन धीरे-धीरे इन नदियों के अस्तित्व पर संकट गहरा गया। अब यह नदियां केवल बरसाती नदियों में तब्दील हो चुके हैं। इसमें प्रमुख रूप से चंद्रभागा, सुसुवा, जाखन, सौंग, राही, गूलर, दुल्हनी, टौंस, तमसा, रिस्पना, बिंदाल, बाण गंगा, सूखी नदी, गौतम कुंड नदी, घंट्टे खोला, काली गाढ, आसन नदी आदि शामिल हैं। ये नदियां संकट के दौर से गुजर रही हैं।

न कचरा प्रबंधन कर पाए और न पर्यावरण प्रदूषण की निगरानी
आज हम विश्व पर्यावरण दिवस मना रहे हैं, लेकिन पर्यावरण को सुरक्षित रखने के जो छोटे-छोटे कदम हैं, उनमें हम बेहद पिछड़े हुए हैं। सोशल डैवलपमेंट फॉर कम्यूनिटीज (एसडीसी) फाउंडेशन के संस्थापक एवं पर्यावरण विशेषज्ञ अनूप नौटियाल ने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर अमर उजाला से विशेष बातचीत में अपनी चिंताएं जाहिर कीं।

हर साल 30 करोड़ किलो कचरा कहां जा रहा है
अनूप नौटियाल ने बताया कि कचरा प्रबंधन आज सबसे बड़ा मुद्दा है। छोटे शहरों और निकायों ने तो निश्चित तौर पर इस दिशा में बेहतर काम किया है, लेकिन देहरादून, हरिद्वार जैसे शहर काफी पिछड़े हुए हैं। उन्होंने अपनी एक स्टडी का हवाला देते हुए बताया कि मंत्रालय ने खुद स्वीकार किया था कि शहरों में 46 प्रतिशत कचरे का निस्तारण होता है।

यानी 54 प्रतिशत कचरे का निस्तारण ही नहीं होता। हमारे शहर लगभग 16 लाख किलो कचरा रोज दे रहे हैं। यानी इसमें से आठ लाख किलो कचरे का निस्तारण होता है और आठ लाख किलो कचरा यूं ही नहरों, नदियों या जंगलों में फेंक दिया जाता है। अनुमान के तौर पर सालभर में 30 करोड़ किलो कचरा यूं ही फेंका जा रहा है जो कि पर्यावरण संरक्षण के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन रहा है।

सिंगल यूज प्लास्टिक का अभियान हो या कचरे से बिजली बनाने के दावे, फाइलों से आगे नहीं बढ़ पाए। उन्होंने कहा कि आज तक उत्तराखंड के किसी भी शहर में इंदौर जैसा मॉडल लागू नहीं हो पाया है। इसी प्रकार, बायोमेडिकल वेस्ट भी बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है।

विस्तार

दून को कभी उत्तराखंड का वेनिस कहा जाता था। यहां कई ऐसी जलधाराएं थीं जो अठखेलियां करती थीं, लेकिन बदलते वक्त और विकास की अंधी दौड़ की वजह से दून को विशिष्ठ पहचान देने वाली नहरें और और नदियां अपना अस्तित्व खो चुकी हैं। कभी जिन नदियों में सालभर पानी बहता था वह अब बरसाती नदी बन गई हैं। कुछ नहरों ने तो नालों का रूप ले लिया लिया है और इनमें गंदगी बह रही है।

वर्तमान में भले ही कंक्रीट का जंगल दून की पहचान बन गया हो, लेकिन दो-ढाई दशक पूर्व ऐसा नहीं था। चारों तरफ हरियाली थी और बासमती की खुशबू फैली रहती थी। जो नहरें बासमती के खेतों, लीची व आम के बागों और साग-सब्जी की पैदावार को प्रोत्साहित करती थीं, और तन-मन को सुकून का अहसास भी कराती थी, वही नहरें आज गुम हो चुकी हैं।

वर्ष 2000 में दून के अस्थायी राजधानी बनने के बाद यहां एक के बाद एक नहरों को भूमिगत कर उन पर सड़कों का जाल बिछा दिया गया। अब यह नहरें कहां हैं, कैसी हालत में हैं किसी को नहीं पता। 

दून की प्रमुख नहरें 

राजपुर नहर- यह दून की सबसे पुरानी नहर मानी जाती थी। इस नहर को मसूरी स्थित रिस्पना नदी के उद्गम स्थल से पानी मिलता था। यह नहर मुख्यत: पीने का पानी मुहैया कराती थी, लेकिन बाद में जरूरी सुधार के बाद यह कुछ गांवों में सिंचाई के उपयोग में आने लगी। 36 किमी लंबी इस नहर से राजपुर, देहरादून, धर्मपुर, कारगी ग्रांट, अजबपुर कलां, अजबपुर खुर्द व बंजारावाला को पानी उपलब्ध करवाया जाता था।

बीजापुर नहर- 1841 में बीजापुर कैनाल नाम से बनी 47 किमी लंबी इस नहर के जरिये बीजापुर, कौलागढ़, बनियावाला, शुक्लापुर, अंबीवाला, रांगड़वाला, आर्केडिया ग्रांट, मोहनपुर ग्रांट आदि क्षेत्रों को पानी उपलब्ध होता था। गढ़ीचौक पर यह नहर दो हिस्सों में बंटकर कौलागढ़ नहर व कांवली नहर नाम से जानी जाती थी। कौलागढ़ से निकलने वाली नहर प्रेमनगर टी-स्टेट तक जाती थी तो कांवली नहर शिमला बाईपास के पीछे खेतों में निकलती थी। 

खलंगा नहर- सौंग नदी से शुरू होने वाली खलंगा नहर है। 100 किमी लंबी यह नहर मालदेवता से शुरू होकर केशरवाला, किद्दूवाला और रायपुर क्षेत्र में खेती के लिए पानी मुहैया कराती थी। रायपुर से आगे चलकर यह नहर रायपुर नहर कहलाती थी। वहां यह कई हिस्सों में बंट जाती थी। यह एक अंडरग्राउंड नहर थी, जो मालदेवता में देखी जा सकती है।

जाखन नहर- 1863 में बनाई गई 31 किमी लंबी यह नहर जाखन नदी के पानी को जाखन व रानी पोखरी के क्षेत्रों तक पहुंचाती थी।

कटापत्थर नहर- 1840 में इस नहर का निर्माण शुरू हुआ, जो 1854 में बनकर तैयार हुई। 26 किमी लंबी इस नहर से कटापत्थर, पिरथीपुर, लाखनवाला, फतेहपुर, तेलपुरा, ढकरानी आदि क्षेत्रों को पानी उपलब्ध करवाया जाता था।

धर्मपुर नहर- रिस्पना नदी से निकलने वाली इस नहर को ईस्ट कैनाल नाम से भी जाना जाता है। यह बारीघाट, दर्शनलाल चौक, नैनी बेकरी, बंगाली कोठी से आगे आकर खेतों में मिल जाती थी। इसी नहर से एक छोटी नहर धर्मपुर में बदरीपुर नहर से कटने वाली छोटी नहर से मिल जाती थी। यह राजपुर फीडर कहलाती थी। यहां से यह रेसकोर्स, चंद्रनगर होते हुए हरिद्वार रोड पहुंचकर कारगी नहर कहलाती थी और बंजारावाला के खेतों तक मिलती थी।


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दून के आसपास की नदियों के अस्तित्व पर भी संकट 



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Author: riteshkucc01

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