ICU से बाहर आने के बावजूद देश की आर्थिक सेहत सुधरने में लगेगा अभी और वक्त

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नई दिल्ली: कोरोना की दूसरी लहर के धीमा पड़ जाने और बहुत कुछ खुल जाने के बाद भी देश की अर्थव्यवस्था बहुत जल्द पटरी पर आती नहीं दिखती. अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि महामारी से पहले वाले आर्थिक हालात देखने के लिए अभी सालभर और लग सकता है. कोरोना काल में करोड़ों लोगों के नौकरी खोने और बैंक कर्ज में डिफाल्टरों की संख्या बढ़ने से जो वित्तीय झटके लगे हैं, उससे उबरने में अभी भी बहुत रुकावटें आ रही हैं.

हालांकि विश्व बैंक ने पिछले महीने जारी की गई एक रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ रेट इस वित्तीय साल में 8.3 फीसदी रहने का अनुमान जताया है. वहीं 2022 के वित्तीय वर्ष में इसके 7.5 फीसदी रहने की संभावना जताई गई है. वर्ल्ड बैंक ने यह भी कहा है कि कोविड-19 महामारी की अब तक की सबसे खतरनाक दूसरी लहर से आर्थिक पुनरूद्धार यानी Economic Revival को नुकसान पहुंचा है.

वहीं अगर भारत सरकार की बात करें तो वह इस पूर्वानुमान के साथ आगे बढ़ रही है कि एक अप्रैल से शुरू हुए वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था 10.5 फीसदी बढ़ेगी, लेकिन पिछले महीने ही देश के सबसे बड़े ऋणदाता भारतीय स्टेट बैंक ने अपने विकास के अनुमान को 10.4 प्रतिशत से घटाकर 7.9 फीसदी कर दिया है. साथ ही बार्कलेज और यूबीएस जैसे कई अंतर्राष्ट्रीय बैंकों ने भी अपने पूर्वानुमानों में कटौती की है. मतलब साफ है कि बैंक भी यह मानकर चल रहे हैं कि पिछले 15 महीने से आईसीयू के बेड पर पड़ी अर्थव्यवस्था के थोड़ा ठीक होने के बावजूद उसे पूरी तरह से ठीक होने में अभी वक्त लगेगा.

वैसे सरकार से लेकर अर्थव्यवस्था के जानकारों तक को ये आशंका सता रही है कि कोरोना की तीसरी लहर भी कहीं घातक रूप लेकर न आए. हालांकि वैज्ञानिकों-विशेषज्ञों का अनुमान है कि तीसरी लहर देश में अब उतनी तबाही नहीं मचाएगी क्योंकि 45 साल से ज्यादा उम्र के अधिकांश लोग वैक्सीन ले चुके हैं और इसी आयु-वर्ग के लोगों की ही कोरोना की पहली और दूसरी लहर में सबसे अधिक मौतें हुईं थीं.

वहीं सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के आंकड़ों के अनुसार कोरोना से उत्पन्न हुई स्थिति ने बेरोजगारी को बढ़ा दिया है, जो जून में 12 महीने के उच्च स्तर यानी 11.9 फीसदी को छू गई है, जबकि यह अप्रैल में 7.97 फीसदी थी. उसके मुताबिक ग्रामीण बेरोजगारी जो आम तौर पर लगभग 6-7 फीसदी के आसपास रहती है, मई -जून में दोहरे अंकों के स्तर पर पहुंच गई है, जिसे चिंताजनक ही कहा जाएगा.

इस दौरान डिफॉल्टरों की संख्या में भी बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. देश की सबसे बड़ी स्वर्ण-वित्तपोषित कंपनियों में से एक मणप्पुरम फाइनेंस लिमिटेड (MNFL.NS) ने जनवरी-मार्च तिमाही में लगभग 55 मिलियन डॉलर मूल्य के सोने की नीलामी की, जबकि पिछली तीन तिमाहियों में यह 1.1 मिलियन डॉलर थी. विशेषज्ञों का कहना है कि सोने के आभूषणों को गिरवी रखकर सुरक्षित कर्ज लेने वाले लोगों में डिफॉल्टरों की संख्या बढ़ने से सोने की निलामी बढ़ रही है, जबकि सोने को गिरवी रखकर लिए गए कर्ज को चुकाने के लिए आमतौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक की व्यवस्था है. ऐसे में सोने की निलामी दीर्घकालिक आर्थिक तनाव का संकेत समझा जाना चाहिए. देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के एचडीएफसी बैंक ने आने वाले महीनों में खुदरा क्षेत्र में और अधिक गड़बड़ी की चेतावनी दी है, जिसमें व्यक्तिगत उपयोग के लिए व्यक्तियों को दिए गए ऋण शामिल हैं.

भारत में चुनाव का सर्वे करने वाली एजेंसी ‘सीवोटर’ द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, बड़ी संख्या में लोगों के जीवन स्तर में तेजी से गिरावट आई है और अधिकांश लोगों को आने वाले 12 महीनों में आशा की कोई किरण नहीं दिख रही है. 

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)



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Author: riteshkucc01

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