उत्तराखंड भूमि कानून: भू-कानून विरोध कितना जमीनी, कितना सियासी, यहां जानिए सारे पहलू

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सार

भूमि कानून के विरोध के समय को लेकर भी सवाल उठे हैं। प्रदेश में विधानसभा चुनावों में ज्यादा वक्त नहीं रह गया है।  

उत्तराखंड
– फोटो : Facebook/House of Travel inc.

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उत्तराखंड में एक बार फिर भूमि कानून का मुद्दा जोर पकड़ गया है। यह मुद्दा आज का नहीं है। इस मुद्दे पर खामोश रहने वाले सियासी दल एकाएक मुखर हो चले हैं। जगह-जगह आंदोलन की सुगबुगाहट है। आंदोलनकारियों का तर्क है अगर यह कानून बना रहा तो बाहरी लोगों का प्रदेश की जमीनों पर कब्जा हो जाएगा।

आर्थिक रूप से कमजोर स्थानीय लोग बेबस और लाचार होकर अपनी जमीनों को बाहरी लोगों के हाथ में जाते हुए देखते रहेंगे। इसी आधार पर इस मुद्दे को कुछ लोग स्थानीय बनाम बाहरी की शक्ल भी देना चाहते हैं।

अपेक्षाकृत पिछड़े प्रदेश उत्तराखंड में पूंजी निवेश को न्योता देने, आर्थिक जरूरत और तकाजों पर अपनी जमीन को मनचाहे दाम पर मनचाहे शख्स को बेचने की आजादी की वकालत भी एक वर्ग करता है। भूमि कानून के विरोध के समय को लेकर भी सवाल उठे हैं। क्योंकि प्रदेश में विधानसभा चुनावों में ज्यादा वक्त नहीं रह गया है।  

आशंका : नहीं बचेगी उत्तराखंडियों के लिए जमीन
भू-कानून का विरोध करने वालों का तर्क है कि प्रदेश में ‘उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि व्यवस्था सुधार अधिनियम 1950 (अनुकलन एवं उपरांतरण आदेश 2001) (संशोधन) अध्यादेश-2018’ के जरिये जमीन की खरीद फरोख्त के नियमों को इतना लचीला कर दिया गया कि अब कोई भी पूंजीपति प्रदेश में कितनी भी जमीन खरीद सकता है। इसमें में जोड़ी गई दो धाराओं को लेकर विरोध हो रहा है। 

स्वत: बदल जाता है भू उपयोग
इस कानून की धारा 143 (क) में यह प्रावधान है पहाड़ में उद्योग लगाने के लिए भूमिधर स्वयं भूमि बेचे या उससे कोई भूमि खरीदे तो भूमि को अकृषि कराने के लिए अलग से कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी होगी। औद्योगिक प्रायोजन से भूमि खरीदने पर भूमि का स्वत: भू उपयोग बदल जाएगा।

एतराज : कानून के लचीले बनने से पहाड़ में खेती की जमीन कम हो जाएगी
अधिनियम की धारा-154 के अनुसार कोई भी किसान 12.5 एकड़ यानी 260 नाली जमीन का मालिक ही हो सकता था। इससे ज्यादा जमीन पर सीलिंग थी लेकिन त्रिवेंद्र सरकार ने अधिनियम की धारा 154 (4) (3) (क) में बदलाव कर उपधारा (2) जोड़ कर न केवल 12.5 एकड़ की बाध्यता को समाप्त कर दिया। बल्कि किसान होने की अनिवार्यता भी खत्म कर दी।

इसी कानून की धारा-156 में संशोधन कर तीस साल के लिए लीज पर जमीन देने का प्रावधान भी कर दिया। ऐसा करने वाला उत्तराखंड देश का एकमात्र राज्य है। चिंता जताई जा रही है कि औद्योगिक निवेश के नाम पर पूंजीपतियों के लिए पहाड़ में भूमि खरीदने का दरवाजा खोल दिया गया। इससे पहाड़ में जमीन नहीं बचेगी और लोग पलायन को मजबूर हो जाएंगे।

नौ नवंबर 2000 को उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद से ही भूमि खरीदने-बेचने और सरकारी भूमि की बंदरबांट के खेल शुरू हुए और इनके विरोध में आवाजें उठीं।

1. राज्य की पहली अंतरिम सरकार की कमान मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी के हाथों में आई। आरोप है कि स्वामी सरकार ने शिक्षण, सामाजिक एवं अन्य संस्थानों और संस्थाओं को कौड़ियों के भाव बेशकीमती जमीन बांट दीं। राज्य के बाहर से आए पूंजीपतियों ने भी जमीन खरीदीं। उत्तराखंड में भूमि खरीद-फरोख्त कारोबार बन गया।

2. वर्ष 2002 के बाद एनडी तिवारी सरकार ने राज्य से बाहर के व्यक्तियों के लिए भूमि खरीद की पहली बार सीमा तय की। उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम में यह प्रावधान किया कि बाहरी व्यक्ति राज्य में 500 वर्ग मीटर से अधिक भूमि नहीं खरीद सकेगा। हालांकि, राज्य आंदोलन से जुड़ा एक बड़ा वर्ग इसके भी विरोध में था।

3. वर्ष 2007 में राज्य में भाजपा की सरकार बनीं। तत्कालीन मुख्यमंत्री जनरल (सेनि.) बीसी खंडूड़ी बाहरी व्यक्तियों के लिए भूमि खरीदने की सीमा को घटाकर 250 वर्ग मीटर कर दिया। भूमि खरीद का यह प्रावधान भी घर बनाने के लिए किया गया।

4. वर्ष 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पर्वतीय क्षेत्रों में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने के मकसद से भू-कानून में संशोधन कराया। इसके तहत चिन्हित सेक्टर में बाहरी राज्य के उद्यमी के लिए 12.50 एकड़ से अधिक भूमि खरीद का रास्ता खोल दिया गया। साथ ही खरीदी गई कृषि भूमि को अकृषि करने की छूट दे दी गई। अब चुनावी साल में कानून में संशोधन का विरोध हो रहा है।

उत्तराखंड में कृषि भूमि का रकबा निरंतर घट रहा है। अखिल भारतीय किसान महासभा ने उत्तराखंड के कृषि परिदृश्य पर जारी पुस्तिका में कहा गया है कि राज्य में कृषि भूमि का रकबा अब केवल 9 प्रतिशत के आसपास रह गया है। इसका मतलब साफ है, उत्तराखंड की सरकार की चिंता में पर्वतीय कृषि कोई मुद्दा न पहले था और न अब है। जब दूसरे हिमालयी राज्यों में कानून हैं तो फिर उत्तराखंड में क्यों नहीं? राज्य में एक सशक्त कानून लाना चाहिए।
– इंद्रेश मैखुरी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं गढ़वाल सचिव, भाकपा (माले)

आपदाओं और पहाड़ का चोली दामन का साथ है। इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता है। उत्तराखंड को अन्य पर्वतीय राज्यों की तरह एक सशक्त भू-कानून की आवश्यकता इसलिए भी है। उत्तराखंड की बसावट की बात करें तो नदी घाटियों को छोड़ अधिकतर बसावट भूस्खलन जोन के ऊपर बसी हुई दिखती है। हर वर्ष सरकार को कुछ गांवों को विस्थापित करना पड़ता है। लेकिन विस्थापन के लिए सरकार हमेशा भूमि का रोना रोती है। जहां कुछ भूमि बची भी है, वह ढालदार होने के कारण बिना दीवारों के उसको समतल नहीं किया जा सकता है। लेकिन इस काम के लिए बजट नहीं होता। इन्ही कारणों से विस्थापन नहीं हो पा रहा है। लोग हारकर भूस्खलन जोन में रहने को मजबूर है। ऐसे सरकार को इस मुद्दे को भी ध्यान में रखते हुए भू-कानून में विस्थापन के लिए सुरक्षित लैंड बनाने की दिशा में भी विचार करना चाहिए।
– रतन सिंह असवाल, संयोजक

कानून में संशोधन को लेकर मांग उठ रही है। पार्टी को इस बात की पूरी जानकारी है। मुख्यमंत्री इस बारे में अपनी राय व्यक्त कर चुके हैं। मुझे पूरी आशा है कि हमारी सरकार जनभावना के अनुरूप जो जनता के हित में होगा वह निर्णय लेगी।
– मदन कौशिक, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा

हम हिमाचल के कानून की बात क्यों करते हैं। राज्य सरकार को चाहिए कि वह अपने राज्य की जरूरतों के हिसाब से भू-कानून तैयार करे। भू-कानून में राज्य में सभी प्रकार की कृषि एवं बागवानी की भूमि की खरीद फरोख्त और लीज पर देने की प्रक्रिया पर पूर्णत: रोक लगनी चाहिए। इसके अलावा कृषि एवं बागवानी की भूमि के भू उपयोग परिवर्तन पर भी स्थायी रूप से रोक लगनी चाहिए। सभी प्रकार की कृषि भूमि के मालिकों को अपने स्वयं के आवासीय प्रयोजन के लिए कृषि भूमि को आवासीय प्रयोजन के लिए उपयोग में लाने के लिए मात्र 250 वर्ग मीटर क्षेत्र की अनुमति उसके जीवनकाल में एक बार दी जानी चाहिए। ताकि परिवार के सदस्यों की संख्या बढ़ने पर वह उसे आवासीय प्रयोजन में उपयोग कर सके। राज्य में औद्योगिक क्षेत्र एंव अन्य परिजनाओं के लिए कृषि भूमि के स्थान पर अन्य प्रकार की भूमि को अधिग्रहित किया जाए।
– चंद्रशेखर करगेती, हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता

सोशल मीडिया पर उत्तराखंड मांगे भू-कानून अभियान
त्रिवेंद्र सरकार में मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार रहे रमेश भट्ट सोशल मीडिया पर उत्तराखंड मांगे भू-कानून अभियान चला रहे हैं। वह भू-कानून को लेकर युवाओं के आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर एक वीडियो के माध्यम से वह बता रहे हैं कि पब्लिक के बीच से ही जानकार लोगों को भू-कानून का एक ड्राफ्ट तैयार कर प्रदेश सरकार को देना चाहिए। रमेश भट्ट भू-कानून के संबंध में फेसबुक संवाद और इंटरव्यू के जरिये आवाज उठा रहे हैं।

वर्तमान में भू-कानून के मुद्दे पर उत्तराखंडी जनमानस में बेचैनी व्याप्त है। मुख्य चिंता भू-माफियाओ द्वारा राज्य के ग्रामीण क्षेत्रो की कृषि भूमि को बड़े पैमाने पर सस्ते में खरीदकर व्यवसाय के नाम पर हथियाने की है। इन जमीनों पर कोई व्यवसाय तो खड़ा नहीं हुआ, लेकिन जमीन कृषक के हाथ से निकल गई। पिछले दिनों टिहरी जनपद के दोगी पट्टी के सिंग्टाली ग्राम का मामला आपको याद होगा। यहां दिल्ली के एक व्यवसाई को 1.1838 हेक्टेयर (11,838 वर्गमीटर) कृषि भूमि क्रय करने की स्वीकृति दी गई और खतौनी में नामान्तरण भी कर दिया गया। इसी व्यक्ति के इशारे पर स्वीकृत सिंग्टाली पुल के मार्च 2020 में टेंडर की प्रक्रिया पर रोक लगा दी गई। जिसका बाद में भारी विरोध हुआ। आखिर सरकार को पुन: पुल को उसी स्थान पर बनाने का फैसला लेना पड़ा। ऐसे अनेक दृष्टांत उपलब्ध हैं,जिससे राज्य के राजस्व प्रशासन में दिशाहीनता व निरंकुशता दृष्टिगोचर होती है।
– एसएस पांगती, पूर्व नौकरशाह (आईएएस)
 

उत्तराखंड मांगे नया भू-कानून, एक दिलचस्प बहस। मुझ जैसे लोगों के लिए यह अत्यधिक प्रसन्नता का विषय है कि ऐसे कानूनी पेचीदगियों भरे विषय पर युवा चर्चा में भाग ले रहे हैं। मैंने लोगों के कमेंट्स पढ़े। मोटे तौर पर लोग, जमीनों की बेखौफ और बिना बंदिश के खरीद-फरोख्त है, उससे चिंतित हैं।

ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड इस दिशा में पहली बार चिंतित हुआ है या जनमत बनाने का प्रयास कर रहा है। उत्तराखंड की जो पहली निर्वाचित सरकार आई, उस सरकार की पार्टी के मेनिफेस्टो में हिमाचल की तर्ज पर भू-कानून बनाने का उल्लेख था। हमने राज्य की प्रस्तावित राजधानी गैरसैंण में भराड़ीसैंण से लगे हुए क्षेत्र के भूखंडों को नोटिफाइड कर दिया था, ताकि वहां की भूमि को कोई खरीदे न सके। 2017 के बाद आई सरकार का चिंतन इस दिशा में कुछ अलग था।

उन्होंने उत्तराखंड में प्रचलित भू-कानून को इंवेस्टमेंट के खिलाफ माना। उन्होंने उत्तर प्रदेश जमीदारी विनाश एवं भू सुधार अधिनियम में संशोधन कर विधानसभा में एक विधेयक पारित करवा लिया। इस विधेयक के माध्यम से उत्तराखंड में भूमि क्रय-विक्रय पर लगी संबंधी पाबंदियां शिथिल कर दी गईं। कानून में कुछ धाराएं जोड़कर पहाड़ों में भूमि खरीद की अधिकतम सीमा को खत्म कर दिया गया।

उत्तराखंड राज्य गठन के बाद प्रतिबंधों के बावजूद कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार 4500 हेक्टेयर भूमि प्रतिवर्ष खेती के दायरे से बाहर हो रही है। क्योंकि जितने भवन बन रहे हैं, जितनी अट्टालिकाएं बन रही हैं और सरकारी निर्माण भी, उनमें अधिकांश यही जमीन हैं। शेष जमीन वन विभाग की हैं, जो भारत सरकार की जमीन हैं। यदि इस क्षति को हम मृदा क्षति के साथ जोड़ें तो बहुत बड़ी पर्यावरणीय क्षति हर वर्ष हो रही है। जिसकी भरपाई की दिशा में कोई बड़ा कदम नहीं उठाया जा रहा है। मैंने अपने कार्यकाल में तीन कदम इस प्रकार के भू-कानून के संबंध में बनाए।

1. पर्वतीय चकबंदी का कानून, जिसके रूल्स इत्यादि बना करके लागू करने का काम राज्य सरकार नहीं कर पा रही है।
2. दूसरा हमने छोटी-छोटी जोतों व छोटे-छोटे जमीनों के टुकड़ों पर जो हमारे शिल्पकार भाइयों से लेकर के किसानों के कब्जे थे, हमने उनका नियमितीकरण कर दिया।
3. तीसरा कदम मैंने उठाया कि मैं चकबंदी का कैडर बनाऊं राज्य के अंदर और राजस्व के अंदर भर्तियां पैमाइशकर्ता जो लोग अमीन आदि हैं, उनकी भी भर्ती हो सके।

मैंने ये मुद्दे, कुछ चर्चा कुछ बहस के लिए उठाए हैं और मुझे खुशी होगी कि इस बहस में यदि कुछ प्रबुद्ध लोग आगे आएं और कुछ नया मार्गदर्शन प्राप्त हो, ताकि 2022 में जो राजनीतिक परिदृश्य बने, उस परिदृश्य में नया भू-कानून एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सके।
(लेखक उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय कांग्रेस के महासचिव हैं।)

विस्तार

उत्तराखंड में एक बार फिर भूमि कानून का मुद्दा जोर पकड़ गया है। यह मुद्दा आज का नहीं है। इस मुद्दे पर खामोश रहने वाले सियासी दल एकाएक मुखर हो चले हैं। जगह-जगह आंदोलन की सुगबुगाहट है। आंदोलनकारियों का तर्क है अगर यह कानून बना रहा तो बाहरी लोगों का प्रदेश की जमीनों पर कब्जा हो जाएगा।


आर्थिक रूप से कमजोर स्थानीय लोग बेबस और लाचार होकर अपनी जमीनों को बाहरी लोगों के हाथ में जाते हुए देखते रहेंगे। इसी आधार पर इस मुद्दे को कुछ लोग स्थानीय बनाम बाहरी की शक्ल भी देना चाहते हैं।

अपेक्षाकृत पिछड़े प्रदेश उत्तराखंड में पूंजी निवेश को न्योता देने, आर्थिक जरूरत और तकाजों पर अपनी जमीन को मनचाहे दाम पर मनचाहे शख्स को बेचने की आजादी की वकालत भी एक वर्ग करता है। भूमि कानून के विरोध के समय को लेकर भी सवाल उठे हैं। क्योंकि प्रदेश में विधानसभा चुनावों में ज्यादा वक्त नहीं रह गया है।  

आशंका : नहीं बचेगी उत्तराखंडियों के लिए जमीन

भू-कानून का विरोध करने वालों का तर्क है कि प्रदेश में ‘उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि व्यवस्था सुधार अधिनियम 1950 (अनुकलन एवं उपरांतरण आदेश 2001) (संशोधन) अध्यादेश-2018’ के जरिये जमीन की खरीद फरोख्त के नियमों को इतना लचीला कर दिया गया कि अब कोई भी पूंजीपति प्रदेश में कितनी भी जमीन खरीद सकता है। इसमें में जोड़ी गई दो धाराओं को लेकर विरोध हो रहा है। 

स्वत: बदल जाता है भू उपयोग

इस कानून की धारा 143 (क) में यह प्रावधान है पहाड़ में उद्योग लगाने के लिए भूमिधर स्वयं भूमि बेचे या उससे कोई भूमि खरीदे तो भूमि को अकृषि कराने के लिए अलग से कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी होगी। औद्योगिक प्रायोजन से भूमि खरीदने पर भूमि का स्वत: भू उपयोग बदल जाएगा।

एतराज : कानून के लचीले बनने से पहाड़ में खेती की जमीन कम हो जाएगी

अधिनियम की धारा-154 के अनुसार कोई भी किसान 12.5 एकड़ यानी 260 नाली जमीन का मालिक ही हो सकता था। इससे ज्यादा जमीन पर सीलिंग थी लेकिन त्रिवेंद्र सरकार ने अधिनियम की धारा 154 (4) (3) (क) में बदलाव कर उपधारा (2) जोड़ कर न केवल 12.5 एकड़ की बाध्यता को समाप्त कर दिया। बल्कि किसान होने की अनिवार्यता भी खत्म कर दी।

इसी कानून की धारा-156 में संशोधन कर तीस साल के लिए लीज पर जमीन देने का प्रावधान भी कर दिया। ऐसा करने वाला उत्तराखंड देश का एकमात्र राज्य है। चिंता जताई जा रही है कि औद्योगिक निवेश के नाम पर पूंजीपतियों के लिए पहाड़ में भूमि खरीदने का दरवाजा खोल दिया गया। इससे पहाड़ में जमीन नहीं बचेगी और लोग पलायन को मजबूर हो जाएंगे।


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राज्य बनने के दिन से है जमीन का खेल



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Author: riteshkucc01

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