बावरा मन: बसंत पंचमी, मां सरस्वती और पतंगबाजी


UKG से क्लास 6th तक मेरा एक बंगाली क्लासमेट हुआ करता था. अच्छा दोस्त था. बिल्कुल 3 इडियट्स के रैंचो की तरह. यानि एक ऐसा दोस्त जो एग्जाम का नतीजा आने पर, आंखों में खटकता है. वो हर टेस्ट और हर इम्तिहान में फर्स्ट आया करता था. और हम?? हम दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवें स्थान पर रोटेट होते रहते थे. यानि, फर्स्ट के नीचे के सारे स्थान ‘up for grabs’ होते, लेकिन क्लास में फर्स्ट पोजिशन, उसी बंगाली दोस्त की होती.

मतलब उस एक दोस्त के कारण, हम में से कोई भी उतने साल, प्रथम स्थान को भोग ही नहीं पाया.ख़ैर इस सब का एक फायदा ये हुआ कि हमने अपने दिल को समझा लिया था कि बेटा, ‘फर्स्ट वर्स्ट में कुछ नहीं रखा, बस top 5 में आते रहो.’ सातवें भी आओ तो शान से कहो, ‘भई, टॉप सेवन में आए हैं.’

यानि छोटी उम्र में ही Narrative गणना भी आ गया था और top पे रहने की ख्वाहिश भी कुछ ज़्यादा बची नहीं थी. समझौता करना भी आ गया और ये भी समझ में आ गया कि जीवन में आप बिना फर्स्ट आए भी, ठीक ठाक कर ही सकते हैं. इसलिए, जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है. कुल मिला के, बचपन की ये शिक्षा, आगे जीवन के लिए बढ़िया रही.

सरस्वती पूजा

ख़ैर, बचपन में अपना कभी भी प्रथम ना आ सकने का हमें कोई कारण नज़र नहीं आता था, परंतु उस दोस्त का प्रथम आने का कारण हमें अच्छी तरह समझ में आ चुका था. क्या है ना, बचपन में हमेशा ऐनुअल एग्जाम से पहले सरस्वती पूजा आती. सरस्वती पूजा वाले दिन वो फर्स्ट आने वाला बंगाली दोस्त, स्कूल नहीं आता था. मेरे बाल मन को शक ही नहीं, पूरा यकीन था, कि वो घर बैठ, ज़रूर सरस्वती जी को साधता है. सरस्वती पूजा इतनी ज़बरदस्त करता है कि उसने ज्ञान की देवी को साध रखा है. इस तरह मां सरस्वती की पूजा का रोल, बावरे बाल मन में, बैठ चुका था. जाने क्यों लगता था, बसंत पंचमी यानि सरस्वती पूजा, और सरस्वती पूजा यानि बंगाली त्योहार. जबकि मेरे अपने घर, मां पीले मीठे चावल बनातीं, पीले कपड़े पहनती. जी, अपनी बसंत पंचमी तो बस पीले कपड़ों और पीले चावलों और हलवे तक ही सीमित थी. सरस्वती जी तक इसकी पहुंच नहीं थी.

बसंत पंचमी कितनी असीमित है, ये तो बाद में जाना…
जाना की कैसे कुछ त्योहार धर्म और सरहदों में बंधे होने की बजाय, प्रेम और प्रांतीय रिवाजों से बंधे होते हैं. अपने खेत खलिहानों से जुड़े होते हैं.नानी की बसंत की कहानी
पर जब दिल्ली आ गए, नानी मिल गईं. नानी की बचपन की कहानियां सुनी तो मालूम चला कि बसंत पंचमी तो पंजाब का भी बड़ा त्योहार होता है. महाराजा रणजीत सिंह जी के ज़माने से ही पंजाब में बसंत के बड़े मेले लगा करते थे. नानी पंजाब के इन मेलों का बड़ा ज़िक्र किया करती थीं. कैसे वो बचपन में नए कपड़े पहन परिवार के साथ गांव के बसंत पंचमी के मेले में जाया करती थीं. कैसे घर के बढ़ते बच्चे पीली ऊन से बुनी नई स्वेटर पहना करते थे. युवतियां, नए दुपट्टे रंगरेजों से पीले रंग में रंगवाती थीं और कैसे जवान लड़के पीली रंगी नई पग यानि पगड़ी सर पर बांधा करते थे. मेले में लड़कियां झूला झूलती थीं, लड़के पतंगबाजी के मुकाबलों में भाग लेते थे. सब मीठे चावल, बसंती हलवा और जलेबी खाया करते थे. ये 1947 के पहले वाले विस्तृत पंजाब के मेले थे. आज के आधुनिक मेलों से ये पुराने मेले, फ्लेवर और कलेवर दोनों में अलग थे. लेकिन एक बात है. बसंत पर आज भी इधर और उधर के पंजाब में पतंगबाजी के मुक़ाबले ज्यों के त्यों वैसे ही होते हैं.

पाकिस्तान के पंजाब में भी
जी, बहुत कम लोग जानते हैं कि बसंत का त्योहार पाकिस्तान में भी जगह जगह बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. हर शहर, हर कस्बा, अपनी अपनी बसंत मनाने की तारीखें पहले ही एनाउंस कर देते हैं. वहां कोई एक मुस्ताकिल तारीख़ नहीं होती. वहां के पंजाबियों के लिए, इस त्योहार की ख़ासियत, पतंगबाजी होती है. जगह जगह पतंगबाजी के आयोजन होते हैं. ज़बरदस्त पेचें लड़ती हैं. पूरा आसमान रंग बिरंगा, इंद्रधनुषी दिखाई देता है. पीले फूलों की बारिश की जाती है जिसमें लोग खुशी से सराबोर नजर आते हैं. माहौल में मलिका पुखराज का गाया गीत, ‘लो फिर बसंत आई, फूलों पे रंग लाई’ तैरता हुआ महसूस होता है.

हालांकि, बीच बीच में तंगदिल मज़हबी शासक, हादसों का हवाला देकर इस त्यौहार पर पाबंदी लगा देते हैं. पर बार बार बसंत की वापसी, गए मौसमों की वापसी की तरह होती है. खुशी की बात है कि पाकिस्तान में इमरान खान सरकार ने, बसंत उत्सव मनाने की फिर से इजाजत दे दी है.

बांग्लादेश की बसंत पंचमी
इधर कुछ साल पहले की बात है. एक बार रेडियो पर बांग्लादेश पर कार्यक्रम करना पड़ा तो बांग्लादेश के बारे में पढ़ना शुरू किया. पढ़ते पढ़ते लगा, ‘आएं?? ये बसंत का त्योहार तो मुस्लिम बहुल पड़ोसी देश भी मनाता है.’

राजधानी ढाका के शिक्षा संस्थानों में बसंत पंचमी का आयोजन बड़े स्तर पर किया जाता है.
ढाका यूनिवर्सिटी और रामकृष्ण मिशन की ओर से कई जगह सरस्वती पूजा के आयोजन किए जाते हैं. ढाकेश्वरी मंदिर और पुराने ढाका के लोगों में इस त्योहार का खास उत्साह देखा जाता है.

बसंत पंचमी के मौके पर यहां रिवाज़ है कि बच्चे को पहली बार लिखना और पढ़ना सिखाया जाता है. यहां के लोगों के लिए यह दिन शिक्षा की शुरुआत के लिए बेहद शुभ माना जाता है.

अमीर खुसरो और निज़ामुद्दीन औलिया
इधर दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन की दरगाह पर, बसंत पंचमी के दिन, हरे रंग की चादर की जगह पीले फूलों की चादर चढ़ाई जाती है, लोग बैठकर बसंत के गीत गाते हैं.

दरअसल अमीर खुसरो, हज़रत निज़ामुद्दीन के सबसे बड़े वाले शिष्य थे. कहते हैं एक दिन खुसरों ने कई औरतों को पीले रंग की साड़ी पहनें और हाथ में गेंदे के फूल लेकर गाना गाते हुए देखा. औरतें बेहद खुश थी. मौसम बसंत का था. हर तरफ खुशहाली थी. अमीर खुसरों को लगा कि क्यों न वो भी अपने गुरु के लिए ये सब करें…

और खुसरो पीले रंग का घाघरा दुपट्टा पहनकर गाने लगे. बस उसी दिन को याद करके आज भी दरगाह पर बसंत पंचमी मनाई जाती है. ख़्वाजा जी के सम्मान में अमीर ख़ुसरो के गीत गाए जाते हैं. दरगाह सरसों के फूलों से महक उठती है. दरगाह को गेंदे के फूलों से सजाया जाता है.सब मिल गाते हैं…

सकल बन फूल रही सरसों
सकल बन फूल रही सरसों,
सकल बन फूल रही….
अम्बवा फूटे, टेसू फूले, कोयल बोले डार डार,
और गोरी करत शृंगार,
मलनियां गढवा ले आई करसों,
सकल बन फूल रही सरसों…
तरह तरह के फूल खिलाए,
ले गढवा हातन में आए.
निजामुदीन के दरवाजे पर,
आवन कह गए आशिक रंग,
और बीत गए बरसों.
सकल बन फूल रही सरसों.

ख़ैर, ये तोह बसंत का तारीखी जुड़ाव हुआ हमारी, सूफ़ी गंगा जमुनी तहजीब से. अब आते हैं नानी के बिछड़े हुए पंजाब के एक बहुत ही पुराने बसंती लोक गीत पे. शर्तिया ये गीत आपको यूट्यूब पे भी नहीं मिलेगा….

एक पुराना पंजाबी बसंत गीत…
चुन्नी रंग दे ललारी, अज आ गई बसंत
रुत आ गई पियारी, गया पाला उड़न्त
(हे रंगरेज़, मेरी चुन्नी पीली रंग दे, प्यारा मौसम आ गया है, जाड़ा खत्म हो गया है )

पीली सरों खिड़ी, खेतां विच आ गई बहार
पीले किकरां दे फुल, कनडयां दे विशकार
(पीली सरसों खेतों के बीच खिली हुई है, यहां तक कि हमेशा कांटों से भरा कीकर भी इस मौसम में पीले फूलों से फूल चुका है)
चुन्नी…

पग रंग दे बसंती, मैं तां जाड़ा अज मेले
मेरी सोनिएं पतंग आसमांना विच खेड़े
(लड़का रंगरेज़ से कह रहा है, ‘आज मेरी पगड़ी बसंती रंग में रंग दे, मुझे मेले जाना है. वहां मेरी सुंदर पतंग आसमानों में उड़ेगी, खेलेगी’)
चुन्नी…

मैं तां झूटियां ते चढ़ के लेड़ें ने हुल्लारे
आज मेला ऐ बहारां दा, वाजां पिया मारे
(लड़की कह रही है, ‘मैंने झूले पे चढ़ के आज पींगें लेनी हैं, बहारों का मेला है और उधर मेरा पिया आवाज़ दे रहा है’.)
चुन्नी…

बसंती गंगा जमुनी है ये धरती️
लोक जीवन और प्रांतीय सभ्यता को धार्मिक बंधनों से परे देखने का त्योहार है बसंत. मेरे बचपन की बावरी यादों में आज भी पीली सरसों सा फूलता, गेंदे सा महकता त्योहार है, बसंत. राज और सिमरन को सरसों के खेत में देख, खुद अपने को उनमें देखना है, बसंत. नानी के प्यार का, उनकी पीली चुन्नी का साया है, बसंत. बचपन में मां की आवाज़ में सुनी ये पद्माकर की कविता है, बसंत…

कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में
क्यारिन में कलिन में कलीन किलकंत है.
कहे पद्माकर परागन में पौनहू में
पानन में पीक में पलासन पगंत है
द्वार में दिसान में दुनी में देस-देसन में
देखौ दीप-दीपन में दीपत दिगंत है
बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में
बनन में बागन में बगरयो बसंत है

ब्रज में, अवध में, पूरब में, उत्तर में, सबको पीले बसंत की खूब सारी शुभकमनाएं.

धन्यवाद





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Author: riteshkucc01

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