आपात समय के लिए मिट्टी के कमरों में कर रहे जौ का भंडारण


जौ की फसल से भरा गया चैंबर।
– फोटो : अमर उजाला

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हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति के लोग आज भी पारंपरिक फसलों जौ (नेह) का आपात समय के लिए भंडारण कर रहे हैं। यह भंडारण एक या दो साल के लिए नहीं, बल्कि 25 से 30 साल तक के लिए कोल्ड स्टोर की भांति मिट्टी से बने कमरों में किया जाता है। जौ को बंद कमरे में रखने के लिए दो से तीन चैंबर बनाए जाते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। बता दें कि स्पीति घाटी में करीब 2750 घर हैं। हर साल 800 से 900 हेक्टेयर में लोग जौ की फसल का उत्पादन करते हैं।

अपर स्पीति में नकदी फसल मटर के साथ जौ की खेती होती है, जबकि लोअर स्पीति में इन फसलों के साथ सेब व सब्जी का उत्पादन होता है। रबी फसल जौ के खाने से कई फायदे हैं। इसमें फायवर की मात्रा भी ज्यादा है। इसके सेवन से कई रोगों पर नियंत्रण होता है। स्पीति घाटी में आज भी पारंपरिक खेती जौ की फसल को लोगों ने जिंदा रखा है।

इस फसल के उत्पादन में लोग रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं करते हैं। स्पीति के किसान महज गोबर की खाद का प्रयोग करते हैं। स्पीति निवासी वीर वैद्य, पलजोर बौद्ध, लामा टशी और वंज्ञाल ने कहा कि स्पीति के बड़े किसान हर साल 15 से 20 क्विंटल तक जौ का भंडारण करते हैं। इस अनाज का धार्मिक अनुष्ठान के दौरान भी बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है। इसे आपात समय के लिए भी भंडारण किया जाता है।

इसके लिए पहले से लोगों ने घरों में अनाज भंडारण के लिए कक्ष तैयार कर रखे हैं। स्पीति के लोग इस अनाज को पत्थर के बड़ी चक्की में पीसकर तैयार करते थे। उसके बाद पानी के घराट व अब बिजली से चलने वाली घराटों से सत्तू तैयार किया जा रहा है।

स्पीति के लोसर में बुधवार को हुए स्नो फेस्टिवल के दौरान स्थानीय महिलाओं ने बाकायदा प्रदर्शनी में यह दिखाया कि प्राचीन काल में स्पीति के लोग किस तरह से जौ की फसल से सत्तू तैयार करते हैं। काजा में तैनात कृषि अधिकारी डॉ. अनिल बौद्ध ने बताया कि स्पीति में करीब 800 से 900 हेक्टेयर में जौ की खेती होती है।

हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति के लोग आज भी पारंपरिक फसलों जौ (नेह) का आपात समय के लिए भंडारण कर रहे हैं। यह भंडारण एक या दो साल के लिए नहीं, बल्कि 25 से 30 साल तक के लिए कोल्ड स्टोर की भांति मिट्टी से बने कमरों में किया जाता है। जौ को बंद कमरे में रखने के लिए दो से तीन चैंबर बनाए जाते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। बता दें कि स्पीति घाटी में करीब 2750 घर हैं। हर साल 800 से 900 हेक्टेयर में लोग जौ की फसल का उत्पादन करते हैं।

अपर स्पीति में नकदी फसल मटर के साथ जौ की खेती होती है, जबकि लोअर स्पीति में इन फसलों के साथ सेब व सब्जी का उत्पादन होता है। रबी फसल जौ के खाने से कई फायदे हैं। इसमें फायवर की मात्रा भी ज्यादा है। इसके सेवन से कई रोगों पर नियंत्रण होता है। स्पीति घाटी में आज भी पारंपरिक खेती जौ की फसल को लोगों ने जिंदा रखा है।

इस फसल के उत्पादन में लोग रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं करते हैं। स्पीति के किसान महज गोबर की खाद का प्रयोग करते हैं। स्पीति निवासी वीर वैद्य, पलजोर बौद्ध, लामा टशी और वंज्ञाल ने कहा कि स्पीति के बड़े किसान हर साल 15 से 20 क्विंटल तक जौ का भंडारण करते हैं। इस अनाज का धार्मिक अनुष्ठान के दौरान भी बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है। इसे आपात समय के लिए भी भंडारण किया जाता है।

इसके लिए पहले से लोगों ने घरों में अनाज भंडारण के लिए कक्ष तैयार कर रखे हैं। स्पीति के लोग इस अनाज को पत्थर के बड़ी चक्की में पीसकर तैयार करते थे। उसके बाद पानी के घराट व अब बिजली से चलने वाली घराटों से सत्तू तैयार किया जा रहा है।

स्पीति के लोसर में बुधवार को हुए स्नो फेस्टिवल के दौरान स्थानीय महिलाओं ने बाकायदा प्रदर्शनी में यह दिखाया कि प्राचीन काल में स्पीति के लोग किस तरह से जौ की फसल से सत्तू तैयार करते हैं। काजा में तैनात कृषि अधिकारी डॉ. अनिल बौद्ध ने बताया कि स्पीति में करीब 800 से 900 हेक्टेयर में जौ की खेती होती है।



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Author: riteshkucc01

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